School Holiday: मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और तनाव का असर अब सिर्फ उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है। इसका सीधा प्रभाव पूरे एशिया की अर्थव्यवस्था, दफ्तरों और शिक्षा व्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। खासतौर पर तब जब ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बंद कर दिया है। यह वही रास्ता है जिससे हर दिन खाड़ी देशों से करीब 2 करोड़ बैरल तेल दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचता है।
इस रास्ते के बंद होते ही वैश्विक तेल सप्लाई चेन में भारी व्यवधान पैदा हो गया है। नतीजा यह हुआ कि कई एशियाई देशों में ईंधन की कमी, महंगाई और ऊर्जा संकट जैसी स्थितियां तेजी से सामने आने लगी हैं। कई सरकारों को तुरंत आपातकालीन फैसले लेने पड़े हैं, जिनमें स्कूल बंद करना, वर्क फ्रॉम होम लागू करना और ऊर्जा बचत के सख्त नियम शामिल हैं।
एशियाई देशों में आपातकालीन फैसले
तेल की कमी और कीमतों में अचानक आई तेजी के कारण एशिया के कई देशों ने असाधारण और सख्त प्रशासनिक कदम उठाए हैं। इन फैसलों का उद्देश्य ईंधन की खपत को कम करना और उपलब्ध संसाधनों को लंबे समय तक बनाए रखना है।
सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान, फिलीपींस, थाईलैंड, वियतनाम, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में दिखाई दे रहा है। इन देशों की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आने वाले तेल पर निर्भर है। जैसे ही सप्लाई प्रभावित हुई, सरकारों ने तुरंत नई नीतियां लागू करनी शुरू कर दीं।
पाकिस्तान में स्कूल बंद और 4-डे वर्क वीक
पाकिस्तान में इस संकट का असर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। सरकार ने पूरे देश में दो हफ्तों के लिए स्कूल बंद करने का फैसला लिया है। इसके अलावा पंजाब प्रांत में 31 मार्च 2026 तक छुट्टियां घोषित कर दी गई हैं।
ऊर्जा की बचत के लिए सरकार ने दफ्तरों में चार दिन का वर्क वीक लागू कर दिया है। इसके साथ ही करीब 50 प्रतिशत कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम करने का निर्देश दिया गया है। सरकार का मानना है कि इससे ट्रांसपोर्ट और बिजली की खपत कम होगी, जिससे तेल की बचत की जा सकेगी।
फिलीपींस में राष्ट्रपति का बड़ा आदेश
फिलीपींस भी इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुआ है क्योंकि वहां की अर्थव्यवस्था करीब 90 प्रतिशत तेल खाड़ी देशों से आयात करती है। जैसे ही सप्लाई बाधित हुई, देश की आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ने लगा।
स्थिति को संभालने के लिए फिलीपींस के राष्ट्रपति ने पूरे देश में 4-डे वर्क वीक लागू करने का आदेश दिया है। सरकार का मानना है कि इससे कार्यालयों में बिजली और ईंधन की खपत कम होगी। साथ ही ट्रैफिक कम होने से भी तेल की बचत होगी।
थाईलैंड में बिजली बचाने के सख्त नियम
थाईलैंड सरकार ने भी तेल संकट को देखते हुए कई महत्वपूर्ण फैसले किए हैं। सरकारी कर्मचारियों को घर से काम करने यानी वर्क फ्रॉम होम करने का निर्देश दिया गया है।
इसके अलावा सरकारी दफ्तरों में एयर कंडीशनर का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस पर फिक्स कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि इससे बिजली की खपत कम होगी और ऊर्जा बचत में मदद मिलेगी।
वियतनाम में कारपूलिंग और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर जोर
वियतनाम सरकार ने ईंधन की खपत कम करने के लिए जनता से कारपूलिंग और सार्वजनिक परिवहन का ज्यादा इस्तेमाल करने की अपील की है। इसके अलावा कंपनियों को वर्क फ्रॉम होम की नीति अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
सरकार का मानना है कि अगर लोग निजी वाहनों का कम इस्तेमाल करेंगे तो ईंधन की मांग कम होगी और संकट को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा।
बांग्लादेश में तेल की राशनिंग और यूनिवर्सिटी बंद
बांग्लादेश ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तेल की राशनिंग शुरू कर दी है। यानी अब सीमित मात्रा में ही ईंधन उपलब्ध कराया जाएगा।
इसके अलावा देश की कई यूनिवर्सिटीज को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है ताकि बिजली और ट्रांसपोर्ट से होने वाले खर्च को कम किया जा सके। यह फैसला इस बात का संकेत है कि सरकार ऊर्जा संकट को कितनी गंभीरता से ले रही है।
श्रीलंका में घबराहट रोकने के लिए कीमतें बढ़ीं
श्रीलंका में हालात अलग तरह के हैं। यहां लोग डर के कारण तेल का ज्यादा स्टॉक खरीदने लगे हैं, जिसे आम भाषा में पैनिक बाइंग (Panic Buying) कहा जाता है।
इस स्थिति को रोकने के लिए सरकार ने ईंधन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी कर दी है। सरकार का मानना है कि इससे अनावश्यक खरीदारी पर रोक लगेगी और बाजार में संतुलन बना रहेगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना अहम
दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह एक संकरा समुद्री मार्ग है जो पर्शियन गल्फ को अरब सागर से जोड़ता है।
दुनिया के कई बड़े तेल उत्पादक देश जैसे सऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात से निकलने वाला अधिकांश तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यही कारण है कि इसे दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई लाइन माना जाता है।
जब युद्ध के कारण ईरान ने इस रास्ते पर निगरानी बढ़ा दी और जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में तुरंत उथल-पुथल शुरू हो गई।
बड़े देशों की चिंता और इमरजेंसी रिजर्व
इस संकट को देखते हुए जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे बड़े एशियाई देश अब अपने इमरजेंसी ऑयल रिजर्व खोलने पर विचार कर रहे हैं। यह वह तेल भंडार होता है जिसे सरकारें संकट की स्थिति के लिए सुरक्षित रखती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह संकट लंबे समय तक जारी रहा तो दुनिया भर में तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती हैं। ताइवान और दक्षिण कोरिया में पहले ही तेल की कीमतें 30 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
भारत में फिलहाल स्थिति सामान्य
भारत में फिलहाल पेट्रोल और डीजल की सप्लाई सामान्य बनी हुई है, जिससे आम लोगों को अभी सीधे तौर पर कोई बड़ी परेशानी नहीं हुई है। लेकिन इस संकट का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है।
सबसे ज्यादा असर विमान ईंधन यानी जेट फ्यूल (Jet Fuel) पर पड़ा है। इसकी कीमत बढ़ने के कारण हवाई किराए में करीब 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो गई है।
इसके अलावा कई जगह एलपीजी गैस सिलिंडर की डिलीवरी में भी देरी की खबरें सामने आ रही हैं। सरकार ने संकेत दिए हैं कि अगर वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता रहा तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं।
ऑस्ट्रेलिया में डर से बढ़ी मांग
ऑस्ट्रेलिया में स्थिति थोड़ी अलग है। यहां फिलहाल तेल की सप्लाई में कोई बड़ी कमी नहीं है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संकट की खबरों के बाद लोग भविष्य की चिंता में ज्यादा तेल खरीदकर स्टॉक जमा करने लगे हैं।
इस अचानक बढ़ी मांग को डिमांड स्पाइक (Demand Spike) कहा जा रहा है। इससे सरकार की चिंता बढ़ गई है क्योंकि अगर लोग जरूरत से ज्यादा ईंधन जमा करेंगे तो बाजार में असंतुलन पैदा हो सकता है।
यूरोप पर भी मंडरा रहा संकट
हालांकि यूरोप सीधे तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पूरी तरह निर्भर नहीं है, लेकिन वहां भी इस संकट की आहट महसूस होने लगी है। यूरोप का करीब 50 प्रतिशत जेट फ्यूल खाड़ी देशों से ही आता है।
नॉर्थवेस्ट यूरोप में जेट फ्यूल की कीमत 1500 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है, जो हाल के वर्षों में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक मानी जा रही है। इसके कारण हवाई यात्रा, बिजली उत्पादन और माल ढुलाई की लागत भी तेजी से बढ़ने लगी है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई, ट्रांसपोर्ट लागत और उत्पादन खर्च सभी बढ़ जाते हैं।
इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है क्योंकि खाने-पीने की चीजों से लेकर बिजली और यात्रा तक सब कुछ महंगा हो सकता है। इसलिए दुनिया भर की सरकारें इस संकट पर नजर बनाए हुए हैं और कूटनीतिक समाधान तलाशने की कोशिश कर रही हैं।






